
जदि वि सयं थिरबुद्धी तहा वि संसग्गिलद्दपसराए ।
अग्गिसमीवे व घदं विलेज्ज चित्तं खु अज्जाए॥338॥
साधु स्वयं दृढ़ हो तथापि यदि आर्याओं के संग रहे ।
आर्याओं का चित्त द्रवित हो यथा अग्नि संग घी पिघले॥338॥
अन्वयार्थ : यद्यपि अपनी स्थिरबुद्धि हो तो भी आर्यिका का संसर्ग करके पाया है प्रसार जिसने, ऐसी अग्नि के समीप घी की तरह चित्त/मन तत्काल पिघल जाता है, बिगड जाता है, आर्यिका का चित्त भी पिघल जाता है । केवल आर्यिका का संग ही छोडने को नहीं कहा, बल्कि सम्पूर्ण स्त्री मात्र की संगति का त्याग करना श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी