सव्वत्थ इत्थिवग्गम्मि अप्पमत्तो सया अवीसत्थो ।
णित्थरदि बम्भचेरं तव्विवरीदो ण णित्थरदि॥339॥
सभी नारियों में विश्वास विहीन और अप्रमादी हो ।
ब्रह्मचर्य ही पार लगाये अन्य न कोई पार करे॥339॥
अन्वयार्थ : बालिका, कन्या, यौवनवती, वृद्धा, कुरूपा, रूपवती, दरिद्री, धनवती, वेषधारिणी इत्यादि कोई भी स्त्री जाति में हो, जो जिन-आज्ञा में सावधान हैं, वे किसी भी स्त्री का विश्वास नहीं करते । वे ब्रह्मचर्य की रक्षा करने में समर्थ हैं और जो स्त्रीमात्र में विश्वास करेगा, वचनालाप करेगा, अंगों का अवलोकन करेगा, प्रमादी रहेगा, सावधानी छोडेगा; वह ब्रह्मचर्य की रक्षा नहीं करेगा, बिगडेगा ही ।

  सदासुखदासजी