
सव्वत्तो वि विमुत्तो साहू सव्वत्थ होइ अप्पवसो ।
सो चेव होदि अज्जाओ अणुचरंतो अणप्पवसो॥340॥
सर्व संग परिमुक्त साधु सर्वत्र आत्मवश होते हैं ।
किन्तु आर्यिका-संग करें जो वे अनात्मवश होते हैं॥340॥
अन्वयार्थ : जो साधु सर्व गृह, धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, भोजन, भाजन, नगर, ग्रामादि से भी न्यारा/पृथक् हो गया है और सर्वत्र देश-काल में स्वाधीन है, ऐसा साधु भी आर्यिका की संगति करने से पराधीन हो जाता है । विषय-कषायों के आधीन होकर भ्रष्ट हो जाता है ।
सदासुखदासजी