खेलपडिदमप्पाणं ण तरदि जह मच्छिया विमोचेदुं ।
अज्जाणुचरो ण तरदि तह अप्पाणं विमोचेदुं॥341॥
जैसे कफ में फँसी हुई मक्खी खुद को न छुड़ा सकती ।
वैसे खुद को छुड़ा सके नहिं मुनि आर्या का अनुगामी॥341॥
अन्वयार्थ : जैसे कफ में पड गई मक्खी अपने को कफ में से निकालने में असमर्थ है, वैसे ही आर्यिका की संगति करनेवाला साधु अपने को कामादि से, रागादि से निकालने में समर्थ नहीं होता ।

  सदासुखदासजी