
साधुस्स णत्थि लोए अज्जासरिसी खु बंधणे उवमा ।
चम्मेण सह अवेंतो ण य सरिसो जोणिकसिलेसो॥342॥
आर्या के संग साधु के बन्धन की उपमा नहिं कोई ।
वज्रलेप ज्यों रहे चर्म संग यह उपमा भी उचित नहीं॥342॥
अन्वयार्थ : लोक में साधु को बाँधने के लिये आर्यिका समान किसी की उपमा नहीं । जैसे चर्म से बाँधे गये बंधन के समान और कोई बंधन नहीं ।
इस प्रकार आठ गाथाओं द्वारा आर्यिका की संगति का वर्जन/त्याग करना कहा ।
सदासुखदासजी