
अण्णं पि तहा वत्थुं जं जं साधुस्स बंधणं कुणदि ।
तं तं परिहरह तदो होहदि दढसंजदा तुज्झ॥343॥
और अन्य भी जो पदार्थ मुनि को करते परतन्त्र अहो ।
उन सबका परित्याग करो जिससे तेरा संयम दृढ़ हो॥343॥
अन्वयार्थ : जैसे आर्यिका की संगति बन्ध का कारण जानकर त्याग करना उचित है, वैसे ही और भी जो-जो वस्तुएँ साधु को कर्मबंधन करानेवाली हैं, उन सभी का त्याग करो; जिससे कि तुम्हारे दृढ संयमीपना होवे ।
सदासुखदासजी