पासत्थादीपणयं णिच्चं वज्जेह सव्वधा तुम्हे ।
हंदि हु मेलणदोसेण होइ पुरिसस्स तम्मयदा॥344॥
पार्श्वस्थादिक पाँच1 तरह के खोटे मुनि का संग तजो ।
उनका संग करने से होता उन जैसा परिणाम अहो॥344॥
अन्वयार्थ : भो मुनीश्वर! जो पार्श्वस्थादि पंच प्रकार से भ्रष्ट मुनि हैं, उनकी संगति का सदा ही सर्वथा त्याग करो । यदि पार्श्वस्थादि की संगति नहीं त्यागते हैं तो बाद में उनके साथ तन्मयता/एकता हो जाती है, अत: संगति के दोष से पुरुष के साथ एकता हो जाती है ।
इस ग्रन्थ में पार्श्वस्थादि पाँच प्रकार के भ्रष्ट मुनियों का कथन अट्ठाईस गाथाओं में आगे अनुशिष्टि अधिकार में करेंगे, तथापि यहाँ जानने के लिये मूलाचार ग्रन्थ से तथा मूलाचार प्रदीपक से (संक्षेप में) लिखते हैं - 1. पार्श्वस्थ, 2. कुशील, 3. संसक्त, 4. अपगतसंज्ञ, 5. मृगचारी - ये भ्रष्ट मुनियों की पाँच जातियाँ हैं । इनमें भेष तो दिगम्बर मुनि का और वह दर्शन, ज्ञान, चारित्र से रहित जानना । उनमें से ऐसे ये पाँच प्रकार के भ्रष्ट मुनि दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप, विनय - इनसे अत्यंत दूरवर्ती गुणों के धारकों के छिद्र/दोष देखने में तत्पर ऐसे पार्श्वस्थादि की वंदना, प्रशंसा, संगति करने योग्य ही नहीं है । इनको शास्त्रादि विद्या के लोभ से या राग से, भय से कदाचित् कभी भी वन्दना-विनयादि नहीं करना । जो इन भ्रष्ट मुनियों की संगति करते हैं, वे भी पार्श्वस्थादिपने को प्राप्त हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी