इस ग्रन्थ में पार्श्वस्थादि पाँच प्रकार के भ्रष्ट मुनियों का कथन अट्ठाईस गाथाओं में आगे अनुशिष्टि अधिकार में करेंगे, तथापि यहाँ जानने के लिये मूलाचार ग्रन्थ से तथा मूलाचार प्रदीपक से लिखते हैं - 1. पार्श्वस्थ, 2. कुशील, 3. संसक्त, 4. अपगतसंज्ञ, 5. मृगचारी - ये भ्रष्ट मुनियों की पाँच जातियाँ हैं । इनमें भेष तो दिगम्बर मुनि का और वह दर्शन, ज्ञान, चारित्र से रहित जानना । उनमें से
- जिनका वसतिका में राग हो वा वसतिका, मठ, मकान, एक जगह अपनी बाँध रखी हो, जिसके शरीरादि में बहुत मोह, ममता हो, कुमार्गगामी हो, उपकरणों का रात-दिन संग्रह करने में उद्यमी हो, भावों की विशुद्धता से रहित हो, संयमीजनों से दूर रहता हो, दुष्ट हो, असंयमियों की संगति करनेवाला हो, इन्द्रियों को जीतने में असमर्थ हो, कषाय जीतने में असमर्थ हो, द्रव्यलिंग का धारण करनेवाला रत्नत्रय से रहित, वह [[पार्श्वस्थ]] मुनि है । वह स्तुति, नमस्कार करने योग्य नहीं है - ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है
- अब [[कुशील]] का लक्षण कहते हैं - जिनका कुत्सित, निंद्य शील/स्वभाव हो, उसे कुशील जानना । जिनका आचरण निंद्य हो, स्वभाव जिनका निंद्य हो, क्रोधादि से व्याप्त जिनका मन हो; व्रत, शील, गुणों से रहित हो, धर्म का अपयश करनेवाला हो, संघ का अपवाद करनेवाला हो, उन्हें कुशील कहते हैं ।
- अब [[संसक्त]] का लक्षण कहते हैं - जो दुर्बुद्धि असंयमियों के गुणों में आसक्त हो, आहार में जिसकी अतिगृद्धता-लम्पटता हो और भोजन की लम्पटता से वैद्यविद्या, ज्योतिष्कादि विद्या करनेवाला हो तथा राजादि की सेवा में तत्पर हो, मूर्ख हो, मंत्र, तंत्र, यंत्रादि विद्या करने में तत्पर हो; वह निर्ग्रन्थ लिंग का धारक भी भ्रष्टाचारी संसक्त है ।
- अब [[अपगतसंज्ञ]] का लक्षण कहते हैं । इसे अवसन्न भी कहते हैं । जो सम्यग्ज्ञानादि संज्ञा से नष्ट/नाम भी न हो, वह अपगतसंज्ञ है । जो चारित्र से रहित हो, जिनका वचन ज्ञान से रहित हो, जो सांसारिक सुख में आसक्त हो, वह अपगतसंज्ञ है ।
- अब [[मृगचारी]] का लक्षण कहते हैं - जो मृग/वन का पशु उसके समान स्वेच्छाचारी हो, पाप का करनेवाला हो, जैनमार्ग को दूषण लगानेवाला हो, आचार्यादि के उपदेशरहित एकाकी परिभ्रमण करता हो, धैर्यरहित हो, तप के मार्ग से परांगमुख हो, जिनसूत्रादि का अविनयी हो, वह मृगचारी है ।
ऐसे ये पाँच प्रकार के भ्रष्ट मुनि दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप, विनय - इनसे अत्यंत दूरवर्ती गुणों के धारकों के छिद्र/दोष देखने में तत्पर ऐसे पार्श्वस्थादि की वंदना, प्रशंसा, संगति करने योग्य ही नहीं है । इनको शास्त्रादि विद्या के लोभ से या राग से, भय से कदाचित् कभी भी वन्दना-विनयादि नहीं करना । जो इन भ्रष्ट मुनियों की संगति करते हैं, वे भी पार्श्वस्थादिपने को प्राप्त हो जाते हैं ।