
लज्जं तदो विहिंसं पारंभं णिव्विसंकदं चेव ।
पियधम्मो वि कमेणारुहंतओ तम्मओ होइ॥345॥
पहले संग करने से लज्जा ग्लानि असंयम से होती ।
फिर निःशंक आरम्भ परिग्रह क्रम से वृत्ति उन जैसी1॥345॥
अन्वयार्थ : जिसे धर्म अत्यंत प्रिय हो, ऐसा साधु भी यदि पार्श्वस्थादि का संग करता है, तब प्रथम तो हीनाचार में प्रवर्तन करने में जो लज्जा थी/लज्जाआती थी, वह हीनाचारी की संगति से नष्ट हो जाती है, बाद में जो स्वयं को असंयमभाव में ग्लानि थी, "ऐसा निंद्यकर्म मैं कैसे करूँ?" लज्जा चली जाने के बाद वह ग्लानि भी नष्ट हो जाती है । बाद में चारित्रमोह के उदय में परवश हुआ आरंभ-पापादि में नि:शंक प्रवर्तता हुआ पार्श्वस्थादि के साथ एकता को प्राप्त हो जाता है ।
सदासुखदासजी