संविग्गस्सवि संसग्गीए पीदी तदो य बीसंभो ।
सदि वीसम्भे य रदी होइ रदीए वि तम्मयदा॥346॥
संग से संवेगी को भी हो प्रथम प्रीति उससे विश्वास ।
फिर उनमें रति होती रति से होता है वह उन जैसा॥346॥
अन्वयार्थ : जो संसार परिभ्रमण से अत्यन्त भयभीत भी हो, वह भी पार्श्वस्थादि के संसर्ग से प्रीति को प्राप्त होता ही है और प्रीति से विश्वास होता है, विश्वास से आसक्ति/रति होती है और रति से पार्श्वस्थादि के साथ एकत्व को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी