+ अब दुर्जनसंगति त्यागने योग्य है, वह दृष्टान्त द्वारा बतलाते हैं - -
जइ भाविज्जइ गंधेण मट्टिया सुरभिणा व इदरेण ।
किह जोएण ण होज्जो परगुणपरिभाविओ पुरिसो॥347॥
यदि सुगन्ध अथवा दुर्गन्ध के संग से मिट्टी हो वैसी ।
तो पुरुषों की वृत्ति भी संग से हो क्यों न उन जैसी॥347॥
अन्वयार्थ : जो मृत्तिका/मिट्टी उसे सुगंध वा दुर्गंध की भावना से देखिये तो मिट्टी भी संयोग से सुगंधित-दुर्गंधित हो जाती है तो चेतन मनुष्य संगति से पर के गुणों से भावनारूप कैसे नहीं होगा?

  सदासुखदासजी