
जो जारिसीय मेत्ती केरइ सो होइ तारिसो चेव ।
वासिज्जइ च्छुरिया सा रिया वि कणयादिसंगेण॥348॥
जो जिसकी मैत्री करता है वह वैसा ही हो जाता ।
लोह-छुरा भी स्वर्णादिक के संग से हो वैसा जाता॥348॥
अन्वयार्थ : अर्थाक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्तिक, अनुयोग, प्राभृतक प्राभृतकप्राभृतक, वस्तु, पूर्व के ये नौ भेद और एक-एक अक्षर की वृद्धि आदि यथासंभव वृद्धि लिये इन्हीं अक्षरादि के समास, उनसे नौ भेद
सदासुखदासजी