
दुज्जणसंसग्गीए पजहदिं णियगं गुणं खु सुजणो वि ।
सीयलभावं उदयं जह पजहदि अग्गिजोएण॥349॥
दुर्जन के संग से सज्जन भी तज देते हैं सज्जनता ।
यथा अग्नि के संग से जल भी तज देता है शीतलता॥349॥
अन्वयार्थ : दुर्जन की संगति करके सज्जन भी अपने गुणों को छोड देता है । जैसे शीतल है स्वभाव जिसका ऐसा जल भी अग्नि के संयोग से अपने शीतल स्वभाव को छोडकर तप्तपने को प्राप्त हो जाता है ।
सदासुखदासजी