
सुजणो वि होइ लहुओ दुज्जणसंमेलणाए दोसेण ।
माला वि मोल्लगरुया होदि लहू मडयसंसिट्ठा॥350॥
दुर्जन की संगति से सज्जन भी तजते अपना गौरव ।
यथा मृतक पर फूलों की माला भी तजती निज गौरव॥350॥
अन्वयार्थ : सुजन/सज्जन और दुर्जन का मिलाप, यही है दोष, उससे हलका/हीन होता है, जैसे बहुत मूल्यवान पुष्पमाला भी मिट्टी के संश्लेष/संबंध से लघु/मूल्यहीन हो जाती है ।
सदासुखदासजी