दुज्जणसंसग्गीए संकिज्जदि संजदो वि दोसेण ।
पाणागारे दुद्धं पियंतओ बम्भणो चेव॥351॥
दुर्जन-संग से त्यागी में भी दोषों की शंका होती ।
मदिरालय में दूध पिये ब्राह्मण लगता मदिरा सेवी॥351॥
अन्वयार्थ : दुर्जन की संगति से लोक में संयमी को भी दोष सहित है - ऐसी शंका कर लेते हैं । जैसे कलाल के घर में दुग्धपान करते हुए ब्राह्मण पर भी लोक मदिरा पीने की शंका करते हैं ।

  सदासुखदासजी