
परदोसगहणलिच्छो परिवादरदो जणो खु उस्सूणं ।
दोसत्थाणं परिहरह तेण जणजंपणोगासं॥352॥
जन, पर-दोष ग्रहण के इच्छुक दोष-कथन में रस लेते ।
अतः दोष से दूर रहो अन्यथा लोग अवसर पाते1॥352॥
अन्वयार्थ : लोक स्वभाव से ही पर के दोष ग्रहण करने में वांछावान है और पर की निन्दा में अत्यंत आसक्त है । इस कारण से दुर्जन की संगति करोगे तो लोक को तुम्हारी निन्दा करने का अवसर मिल जायेगा । इसलिए लोकनिन्दा का अवसर और दोषों के स्थान ऐसे दुर्जन पापी मिथ्यादृष्टिजन की संगति का त्याग करो ।
सदासुखदासजी