
अदिसंजदो वि दुज्जणकएण दोसेण पाउणइ दोसं ।
जह घूगकए दोसे हंसो य हओ अपावो वि॥353॥
महासंयमी भी दुर्जनकृत दोषों से अनर्थभागी ।
उल्लू द्वारा किये दोष से मौत हंस की आ जाती॥353॥
अन्वयार्थ : अति संयमी साधु भी दुर्जन/मिथ्यादृष्टि की संगति से उत्पन्न दोष के द्वारा दोष को प्राप्त होता है । जैसे निर्दोष हंस भी अपराधी घू-घू/उल्लू पक्षी की संगति से नाश को प्राप्त हुआ ।
सदासुखदासजी