दुज्जणसंसग्गीए विभाविदो सुयणमज्झयारम्मि ।
ण रमदि रमदि य दुज्जणमज्झे वेरग्गमवहाय॥354॥
दुर्जन-संग के रसिकजनों को सज्जन-संग नहीं भावे ।
तजकर वे वैराग्य भाव दुर्जन-संगति में ही रमते॥354॥
अन्वयार्थ : दुर्जन की संगति से भावना को पाता हुआ साधु सुजन उत्तम पुरुष उनके बीच में नहीं रहता है, वैराग्य छोडकर दुष्टों के बीच रहता है ।

  सदासुखदासजी