+ अब सुजनों की संगति करने से गुण प्राप्त होते हैं, उनको कहते हैं - -
जहदि य णिययं दोसं पि दुज्जणो सुयणवइयरगुणेण ।
जह मेरुमल्लियंतो काओ णिवयच्छविं जहदि॥355॥
सज्जन की संगति से दुर्जन भी तज देते अपना दोष ।
यथा मेरु के आश्रय से कौवा भी अपना तजे कुरूप॥355॥
अन्वयार्थ : सज्जन का मिलाप करके दुष्ट भी अपने दोष को त्याग देता है । जैसे मेरु के शिखर को प्राप्त/शिखर पर बैठा हुआ काक पक्षी अपनी कृष्ण प्रभा को त्याग देता है ।

  सदासुखदासजी