कुसुममगंधमवि जहा देवयसेसत्ति कीरदे सीसे ।
तह सुयणमज्झवासी वि दुज्जणो पूइओ होइ॥356॥
देवाशीष मानकर धरते, गन्ध रहित सुमनों को शीश ।
वैसे सज्जन संग में दुर्जन भी हो जाते पूज्य कुलीन॥356॥
अन्वयार्थ : जैसे सुगंधरहित पुष्प को देवता की आसिका जानकर मस्तक पर चढाते हैं । तैसे ही सुजनों के मध्य वास करता हुआ दुर्जन पूज्य होता है/आदरने योग्य होता है ।

  सदासुखदासजी