संविग्गाणं मज्झे अप्पियधम्मो वि कायरो वि णरो ।
उज्जमदि करुणचरणे भावणभयमाणलज्जाहिं॥357॥
जिसे धर्म से प्रेम नहीं वह कायर1 संवेगी संग में ।
मान, लाज, भय, भाव-पाप को तजने का यत्न करे॥357॥
अन्वयार्थ : जिसे धर्म प्रिय नहीं है और दु:ख-परीषह सहने में अत्यन्त कायर है, ऐसा पुरुष भी संसार से भयभीत ऐसे संयमियों के मध्य वास करने से बारंबार धर्म की प्रभावना सुनकर, भय से, अभिमान से, लज्जा से चारित्र में उद्यमी होता है ।

  सदासुखदासजी