
संविग्गोवि य संविग्गदरो संवेगमज्झयारम्मि ।
होइ जह गंधजुत्ती पयडिसुरभिदव्वसंजोए॥358॥
संवेगी, संवेगी के संग रहकर अधिक विरागी हो ।
कृत्रिम गन्धयुत वस्तु, सुगन्धित वस्तु के संग सुरभित हो॥358॥
अन्वयार्थ : और जो स्वयं संविग्न हो/संसार, देह, भोगों से विरक्त हो, वीतरागियों के मध्य रहे, वह साधु पुरुष अत्यंत संविग्नतर होता है/अत्यन्त वीतरागी होता है । जैसे जो प्रकृति से ही सुगंधित द्रव्य हो और फिर अधिक सुगंधवाले द्रव्यों का संयोग मिल जाये, तब तो अत्यन्त सुगंधित हो ही जाता है, ऐसा जानना ।
सदासुखदासजी