
पासत्थसदसहस्सादो वि सुसीलो वरं खु एक्को वि ।
जं संसिदस्स सीलं दंसणणाणचरणाणि वढ्ढंती॥359॥
लाखों पार्श्वस्थ1 यति हों पर एक सुशील यति है श्रेष्ठ ।
उसके आश्रय से दृग्-ज्ञान-चरित्र शील वृद्धिंगत हों॥359॥
अन्वयार्थ : चारित्ररहित, ज्ञान, दर्शन रहित ऐसे भ्रष्ट मुनि लाख-करोड हों, उनकी अपेक्षा सुशील/उत्तम आचार को धारण करनेवाला एक ही श्रेष्ठ है । अत: सुशील भावलिंगी के आश्रय से शील/दर्शन, ज्ञान, चारित्र वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी