
संजदजणावमाणं पि वरं दुज्जणकदादु पूजादो ।
सीलविणासं दुज्जणसंसग्गी कुणदि ण दु इदरं॥360॥
दुर्जन कृत पूजा से उत्तम संयमियों द्वारा अपमान ।
दुर्जन संग है शील विनाशक, संयत करें उसे वर्धमान॥360॥
अन्वयार्थ : कोई यह कहे कि सत्यार्थ संयमी तो हमारा आदर ही नहीं करते और पार्श्वस्थ बहुत आदर करते हैं, प्रीति करते हैं । उसे कहते हैं कि दुर्जनों के द्वारा की गई पूजा से संयमीजनों द्वारा किया गया अपमान श्रेष्ठ है; क्योंकि दुर्जन की संगति ज्ञान-दर्शन रूप आत्मस्वभाव का नाश करती है और संयमीजनों की संगति ज्ञान-दर्शनादिरूप आत्मस्वभाव को प्रगट करती है, उज्ज्वल करती है ।
सदासुखदासजी