आसयवसेण एवं पुरिसा दोसं गुणं व पावंती ।
तह्मा पसत्थगुणमेव आसयं अल्लिएज्जाह॥361॥
इसप्रकार संगति से ही पुरुषों में होते हैं गुण-दोष ।
अतः प्रशस्त गुण युक्त पुरुष का आश्रय लेना ही है श्रेष्ठ॥361॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार आश्रय के वश से पुरुष गुण-दोष को प्राप्त होता है । इसलिए श्रेष्ठ गुणों के धारक साधुजनों का ही आश्रय करो, अधम पार्श्वस्थादि भ्रष्ट मुनियों की संगति मत करो ।

  सदासुखदासजी