पत्थं हिदयाणिट्ठं पि भण्णमाणस्स सगणवासिस्स ।
कडुगं व ओसहं तं महुरविवायं हवइ तस्स॥362॥
गणवासी साधु को हितकर कटुक वचन भी कहने योग्य ।
कड़वी औषधि भी रोगी को मधुर इष्ट फल देने योग्य॥362॥
अन्वयार्थ : मन को जो अनिष्ट भी लगे और परिपाक काल में जिसका फल मीठा हो - ऐसी पथ्यरूप शिक्षा अपने गण/संघ में बसनेवालों को कहते ही हैं । तो वह शिक्षा उन्हें, जैसे कडवी औषधि रोगी को परिपाक काल में मिष्टफल देती है, वैसे ही उदयकाल में भली/अच्छी लगती जाननी ।
कोई यह कहे/सोचे कि पर को अनिष्ट कहने का मुझे क्या प्रयोजन है? इसप्रकार उदासीन नहीं होना । अपनी सामर्थ्य अनुसार धर्मानुराग द्वारा पर के उपकार में प्रवर्तना ही श्रेष्ठ है ।

  सदासुखदासजी