+ अर्थ - मन को जो अनिष्ट भी लगे और परिपाक काल में जिसका फल मीठा हो - -
पत्थं हिदयाणिट्ठं पि भण्णमाणं णरेण घेत्तव्वं ।
पेल्लूदूण वि छूढं बालस्स घदं व तं खु हिदं॥363॥
गुरु के कटुक वचन भी साधू पथ्यरूप से ग्रहण करे ।
ज्यों बालक-मुख में बलात् घी डालें तो भी लाभ करे॥363॥
अन्वयार्थ : जो पथ्य होता है, उसका फल परिपाक काल में मीठा होता है और वर्तमान में मन को अच्छी न भी लगे, तो भी ऐसी कही गई शिक्षा पुरुष को ग्रहण करने योग्य है । कैसी है उत्तम पुरुषों की शिक्षा? जैसे बालक को जबरदस्ती दबाकर दूध-घृतादि पिलाते हैं, वैसी है ।
ऐसे अनुशिष्टि अधिकार में इक्कीस गाथाओें द्वारा पार्श्वस्थादि दुष्ट मुनियों की संगति त्यागने की शिक्षा दी ।

  सदासुखदासजी