
अप्पपसंसं परिहरह सदा मा होह जसविणासयरा ।
अप्पाणं थोवंतो तणलहुहो होदि हु जणम्मि॥364॥
आत्मप्रशंसा सदा छोड़ दो, नाश करो नहिं निज यश का ।
आत्मप्रशंसा करनेवाला जग में तृणवत् लघु होता॥364॥
अन्वयार्थ : भो मुने! अपनी प्रशंसा का सदाकाल त्याग करो । अपनी प्रशंसा करके अपने यश का विनाश करनेवाले मत होओ । अपनी बढाई स्तुति करनेवाले पुरुष लोक में तृण बराबर हलके/हीन हो जाते हैं, सज्जनों के बीच में नीचे/नीच हो जाते हैं ।
सदासुखदासजी