
संतो वि गुणा कत्थंतयस्स णस्संति कंजिए व सुरा ।
सो चेव हवदि दोसो जं सो थोएदि अप्पाणं॥365॥
विद्यमान गुण भी कहने से, काँजी-मदिरा1 सम हों नष्ट ।
अपनी स्वयं प्रशंसा करने से होता है दोष महत्॥365॥
अन्वयार्थ : विद्यमान भी गुण अपने मुख से कहनेवाले पुरुष के गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे काँजी से सुरा/मदिरा या दूध फट जाता है । जिसमें कोई दोष न हो तो भी यही बडा दोष है कि अपनी प्रशंसा करना, अपनी बढाई अपने मुख से करना, इसके समान और दोष नहीं ।
सदासुखदासजी