
संतो हि गुणा अकहिंतयस्स पुरिसस्स ण वि य णस्संति ।
अकहिंतस्स वि जह गहवइणो जगविस्सुदो तेजो॥366॥
विद्यमान गुण कहे न जायें तो भी नष्ट नहीं होते ।
सूर्य स्वयं गुण कहे न फिर भी जग प्रसिद्ध है उसका तेज॥366॥
अन्वयार्थ : अपनी प्रशंसा नहीं करनेवाले सूर्य का तेज जगत में विख्यात होता है, वैसे ही जगत में गुण विख्यात होते हैं ।
सदासुखदासजी