ण य जायंति असंता गुणा विकत्थंतयस्स पुरिसस्स ।
धंति हु महिलायंतो व पंडवो पंडवो चेव॥367॥
जो गुण हैं ही नहीं, न होते कहने से वे गुण उत्पन्न ।
रहता षण्ड॥367॥
अन्वयार्थ : अपनी प्रशंसा करनेवाले पुरुष के अविद्यमान गुण विद्यमान नहीं होते । जब जिसमें गुण ही नहीं हैं और अपने झूठे गुण कहता फिरेगा, उसके कहने से अनहोने गुण और कहाँ से आयेंगे? जैसे अतिशय करके/बहुत अधिक शृंगार करके स्त्री की तरह हाव-भाव, विलास, विभ्रम करता हुआ नपुंसक तो नपुंसक ही है । नपंुसक व्यक्ति स्त्री की तरह आचरण करने से स्त्री नहीं हो जायेगा, नपुसंक ही रहेगा ।

  सदासुखदासजी