
संतं सगुणं कित्तिज्जंतं सुजणो जणम्मि सोदूणं ।
लज्जदि किह पुण सयमेव अप्पगुणकित्तणं कुज्जा॥368॥
विद्यमान गुण की भी सुनें प्रशंसा तो लज्जित होते ।
सज्जन, तो फिर स्वयं प्रशंसा अपनी कैसे कर सकते॥368॥
अन्वयार्थ : सज्जन पुरुषों का यह स्वभाव है कि अपने में विद्यमान गुणों का कोई कीर्तन करे, प्रशंसा करे, तब लोकों के मध्य सुजन पुरुष को लज्जा आती है तो स्वयं ही अपने गुणों का कीर्तन कैसे करेगा? कदापि नहीं करता ।
सदासुखदासजी