+ अपने गुणों का कीर्तन नहीं करने में गुण होते हैं, अब यह दिखाते हैं - -
अविकत्थंतो अगुणो वि होइ सगुणो व सुजणमज्झम्मि ।
सो चेव होदि हु गुणो जं अप्पाणं ण थोएइ॥369॥
स्वयं गुण रहित किन्तु सज्जनों में माना जाता गुणवान ।
आत्म-प्रशंसा करे नहीं - यह ही गुण उनमें हुआ महान॥369॥
अन्वयार्थ : जो गुण रहित भी हो और अपने गुणों की प्रशंसा स्वजनों के बीच नहीं करता, वह सत्पुरुषों के बीच गुणसहित होता है । वह ही प्रगट गुण जानना कि अपना स्तवन नहीं करना ।

  सदासुखदासजी