वायाए जं कहणं गुणाण तं णासणं हवे तेसिं ।
होदि हु चरिदेण गुणाणकहणमुब्भासणं तेसिं॥370॥
वचनों से गुण का कहना तो, करना है उन गुण का नाश ।
आचरने से गुण कहने पर, प्रकटे उनका स्वयं प्रकाश॥370॥
अन्वयार्थ : वचनों से गुणों का कहना, वह तो उन गुणों का नाश करना है और वचन से तो अपने गुण नहीं कहते, लेकिन आचरण करके दिखा देना, यह गुणोंे का प्रगट करना जानना । भावार्थ - उत्तम पुरुष अपने गुण मुख से प्रगट नहीं कहते, परंतु गुणों का आचरण करते हैं तो उससे अपने आप बिना कहे ही जगत में गुण प्रगट हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी