सगुणम्मि जणे सगुणो वि होइ लहुगो णरो विकत्थिंतो ।
सगुणो वा अकहिंतो वायाए होंति अगुणेसु॥372॥
गुणवानों में अपने गुण कहने से लघु होता गुणवान ।
जैसे निर्गुण बीच स्वयं गुण नहिं कहनेवाला गुणवान॥372॥
अन्वयार्थ : गुणवान जनों में गुणवान पुरुष अपने गुण वचनों से कहता तो लघु होता है, छोटा हो जाता है और जो अपने गुणों की स्वयं वचनों से प्रशंसा नहीं करते, वे निर्गुणों में भी स्वयं गुणवान हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी