चरिएहिं कत्थमाणो सगुणं सगुणेसु सोभदे सगुणो ।
वायाए वि कहिंतो अगुणो व जणम्मि अगुणम्मि॥373॥
करनी से कहनेवाला ही गुणीजनों में शोभित हो ।
निर्गुण में अपने गुण कहने वाला निर्गुण शोभित हो॥373॥
अन्वयार्थ : गुणसहित पुरुष गुणवन्तों में आचरण द्वारा गुण प्रगट करे, वह शोभता है; परंतु वचनों से अपनी बढाई करे तो नहीं शोभता । जैसे निर्गुण पुरुषों में निर्गुण पुरुष अपने गुणों को कहता शोभता है ।

  सदासुखदासजी