
सगणे व परगणे वा परपरिपवादं च मा करेज्जाह ।
अच्चासादणविरदा होह सदा वज्जभीरू य॥374॥
निज-गण या पर-गण में करना नहीं दूसरों की निन्दा ।
विरत रहो अति आसादन1 से सदा पाप से तुम डरना॥374॥
अन्वयार्थ : अपने संघ में या परसंघ में पर का परिवाद/पर का अपवाद निंदा मत करो । अत्यासादना अर्थात् पर की विराधना से विरक्त होना और सदाकाल पाप से भयभीत रहना ।
सदासुखदासजी