
आयासवेरभयदुक्खसोयलहुगत्तणाणि य करेइ ।
परणिंदा वि हु पावा दोहग्गकरी सुयणवेसा॥375॥
पर निन्दा है पापरूप भय क्लेश बैर दुःख शोक करे ।
सज्जन को अप्रिय, लघुता, दुर्भाग्यरूप सब दोष करे॥375॥
अन्वयार्थ : खेद, वैर, भय, दु:ख, शोक, लघुपना इत्यादि दोषों को या परनिंदा को उत्पन्न करता ही है तथा परनिंदा पापरूपिणी है, दुर्भाग्य करनेवाली है और यह परनिंदा सुजन/सज्जनों में द्वेष करनेवाली है ।
सदासुखदासजी