
किच्चा परस्स णिंदं जो अप्पाणं ठवेदुमिच्छेज्ज ।
सो इच्छदि आरोग्गं परम्मि कडुओसहे पीए॥376॥
जो पर निन्दा करके अपने को गुणवान कहाते हैं ।
वे कटु औषधि पिला अन्य को खुद निरोग होना चाहें॥376॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष पर की निंदा करके अपने को गुणवानपने से गिनाना/मनवाना चाहता है, वह पुरुष पर/अन्य पुरुष द्वारा कडवी औषधि पीने से अपनी नीरोगता चाहता है । भावार्थ - जैसे कडवी औषधि तो अन्य पुरुष पीता है और रोग रहितपना अपना चाहता है, वैसे अन्य पुरुषों के दोष प्रगट करके स्वयं गुणवान होना चाहे, सो कदापि नहीं होगा ।
सदासुखदासजी