
दट्ठूण अण्णदोसं सप्पुरिसो लज्जिओ सयं होइ ।
रक्खइ य सयं दोसं व तयं जणजंपणभएण॥377॥
देख अन्य के दोष स्वयं लज्जित होते हैं सज्जन गण ।
लोकापवाद के भय से करते निजवत्1 अन्य दोष गोपन॥377॥
अन्वयार्थ : सत्पुरुष अन्य के दोष देखकर स्वयं लज्जा को प्राप्त होते हैं । जैसे अपने दोष को छिपाते हैं, गोपन करते हैं, वैसे ही अन्य के दोष देखकर और संयम की लोक में निंदा होने के भय से पर के दोष प्रगट नहीं करते ।
सदासुखदासजी