अप्पो वि परस्स गुणो सप्पुरिसं पप्प बहुदरो होदि ।
उदए व तेल्लविदू किह सो जंपिहिदि परदोसं॥378॥
सत्पुरुषों को पाकर पर के थोड़े गुण भी दिखें महान ।
जल में तेल बिन्दु-सम, तो क्यों साधु करें पर-दोष कथन॥378॥
अन्वयार्थ : जैसे तेल का बिंदु जल में फैल जाता है, वैसे पर का अत्यन्त अल्प गुण भी सत्पुरुष को प्राप्त होने से बहुत विस्तार को प्राप्त होता है । वे सत्पुरुष पर का दोष कैसे कहेंगे? कैसे प्रगट करेंगे? अपितु नहीं करेंगे ।

  सदासुखदासजी