एस अखंडियसीलो बहुस्सुदो व अपरोवताबी य ।
चरणगुणसुठ्ठिदोत्तिय धण्णस्स खु घोसणा भमदि॥380॥
इनका शील अखण्डित है, बहुश्रुत हैं, पर को कष्ट न दें ।
चारित्र में स्थिर हैं - एेसा पुण्यवान का यश फैले॥380॥
अन्वयार्थ : यह साधु अखंडित शील अर्थात् जिसका ज्ञान, दर्शन स्वभाव खंडित नहीं हुआ, ऐसा है और बहुश्रुत/बहुत शास्त्रों का ज्ञाता है, पर जीवों को संतापित नहीं करनेवाला है तथा चारित्र में सुखपूर्वक विराजित रहता है । ऐसी घोषणा/यश जगत में धन्य पुरुषों का फैलता है, हर किसी पुरुष का ऐसा यश नहीं होता ।

  सदासुखदासजी