
वाढत्ति भाणिदूणं एदं णो मंगलोत्ति यि गणो सो ।
गुरुगुणपरिणदभावो आणंदंसंु णिवाडेइ॥381॥
वचन आपके मंगलकारी - एेसा कह गण स्वीकारे ।
चित्त लगाया है गुरु-गुण में आनन्द के आँसू छलकें॥381॥
अन्वयार्थ : इस शिक्षा को सर्वसंघ सुनकर गुरुजनों से विनती करते हुए कहते हैं - हे भगवन्! आपका वचन हमारे को अतिशयपने से मंगलरूप होगा । ऐसा कहकर और गुरुजनों के भावरूप परिणत हुआ यही है गुण, यह सर्वसंघ में आनंद के अश्रु टपकाते हैं ।
सदासुखदासजी