भगवं अणुग्गहो मे जं तु सदेहोव्व पालिदा अम्हे ।
सारणवारणपडिचोदणाओ धण्णा हु पावेंति॥382॥
प्रभो! आपका अनुग्रह हम पर देह समान किया पालन ।
सारण1 वारण2 और प्रेरणा3 पाते हैं जो वे नर धन्य॥382॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! हमारे ऊपर आप का बडा/महान अनुग्रह है, जो हमारा देह के समान पालन किया । जगत में वे पुरुष धन्य हैं जो गुरुओं के द्वारा सारण, वारण, प्रतिचोदनादि को प्राप्त होते हैं । सारण - पूर्व में पाये हुए रत्नत्रयादि की रक्षा । वारण - रत्नत्रयादि गुणों में अतिचारादि विघ्न आयें, उन्हें टालना और प्रतिचोदना - अर्थात् भो मुने! ऐसा करना, ऐसा मत करना, इसप्रकार प्रेरणा करके रत्नत्रयादि गुणों को बढाना और दोषों को टालकर आत्मा को उज्ज्वल करना । ऐसे सारण, वारण, प्रतिचोदना गुरुजनों द्वारा किसी धन्य पुरुष को प्राप्त होते हैं ।

  सदासुखदासजी