अम्हे वि खमावेमो जं अण्णाणापमादरागेहिं ।
पडिलोमिदा य आणा हिदोवदेसं करिंताणं॥383॥
जो प्रमाद-अज्ञान-रागवश वर्तन है प्रतिकूल किया ।
आज्ञा और हितोपदेश के, अतः माँगते प्रभो! क्षमा॥383॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! हम भी आप से क्षमा चाहते हैं, जो आपका हितरूपी उपदेश, आपकी आज्ञा - 'अज्ञान से, प्रमाद से, रागभाव से विपरीत हुई हो या चूक हुई हो' - लोप की हो ।

  सदासुखदासजी