सव्वजयजीवहिदए थेरे सव्वजगजीवणाथम्मि ।
पवसंते य मरंते देसा किर सुण्णया होंति॥385॥
जग-जन के हितकारी, ज्ञान-तपोधन और जगत के नाथ ।
गमन करें या चिर-वियोग हो तो जग हो बिलकुल सूना॥385॥
अन्वयार्थ : संपूर्ण जगत के जीवों के हितरूप और संपूर्ण तप, ज्ञान, संयम, चारित्र की अधिकता से वृद्धरूप एवं जगत के सर्व जीवों के नाथ, ऐसे आचार्य के मृत्यु में प्रवेश/प्राप्त करने से निश्चय से ही देश शून्य हो जाता है ।

  सदासुखदासजी