सव्वजयजीवहिदए थेरे सव्वजगजीवणाथम्मि ।
पवसंते व मरंते होदि हु देसोंधयारोव्व॥386॥
जग-जन के हितकारी, ज्ञान-तपोधन और जगत के नाथ ।
गमन करें या चिर-वियोग हो तो जग में तम छा जाता॥386॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! सर्व जगत के जीवों के हितू! और ज्ञानादि से वृद्ध तथा सर्व जगत के जीवों के नाथ आचार्य के मरण को प्राप्त होने से सारा जगत अंधकाररूप हो जाता है ।

  सदासुखदासजी