
सव्वस्स दायगाणं समसुहदुक्खाण णिप्पकंपाणं ।
दुक्खं खु विसहिदुं जे चिरप्पवासो वरगुरूणं॥388॥
जो सर्वस्व प्रदान करें सम सुख दुःख और रहें निष्कम्प ।
चिर प्रवास में जाये गुरुवर यह वियोग सहना दुष्कर॥388॥
अन्वयार्थ : सम्पूर्ण दर्शन-ज्ञान-चारित्र के दातार और सुख-दु:ख में समभाव है जिनके तथा उपसर्ग परीषहों में अकंप/निश्चल, ऐसे श्रेष्ठ गुरुओं का चिरकाल के लिए वियोग सहना बहुत ही दु:खद है ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानसंन्यासमरण के चालीस अधिकारों में अनुशिष्टि नामक चौदहवाँ अधिकार एक सौ पाँच गाथा सूत्रों द्वारा पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी