+ आगे परगणचर्या नामक पंद्रहवाँ अधिकार सत्तरह गाथाओं द्वारा कहते हैं- -
एवं आउच्छित्ता सगणं अब्भुज्जदं पविहरंतो ।
आराधणाणिमित्तं परगणगमणे मइं कुणदि॥389॥
इसप्रकार गण से अनुमति ले रत्नत्रय में तत्पर हो ।
आराधना हेतु पर-गण में जाने को अति दृढ़ मति हो॥389॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार संघ से पूछकर और रत्नत्रय में उद्यमी जो आचार्य हैं, वे अपने आराधना पूर्वक मरण के लिए अन्य संघ में जाने की बुद्धि/इच्छा करते हैं ।

  सदासुखदासजी