पं-सदासुखदासजी
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अपने संघ में रहने से इतने दोष
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सगणे आणाकोवो करुसं कलहपरिदावणादी य ।
णिव्भयसिणेहकालुगिणझाणविग्घो य असमाधी॥390॥
आज्ञाकोप1, कठोरवचन, दुःख कलह आदि निर्भयता, स्नेह ।
करुणा, ध्यान-विघ्न, असमाधि निज गण में होते नौ दोष॥390॥
सदासुखदासजी