
उड्डाहकरा थेरा कालहिया खुड्डया खरा सेहा ।
आणाकोवं गणिनो करेज्ज तो होज्ज असमाही॥391॥
वृद्ध मुनि अपयश कर सकते क्षुद्र कलह कर सकते हैं ।
अज्ञानी आज्ञा नहिं माने क्रोधोत्पति करे असमाधि॥391॥
अन्वयार्थ : अपने संघ में रहने से आज्ञा कोप, कठोर वचन, कलह, परितापन, निर्भयता, स्नेह, कारुण्य, ध्यानविघ्न तथा असमाधि - इतने दोष लगते हैं तथा स्थविर मुनि अपयश करनेवाले होते हैं, क्षुद्र मुनि कलह करनेवाले होते हैं, मार्ग को नहीं जाननेवाले कठोर हो जाते हैं । आचार्य की आज्ञा का लोप करते हैं, आज्ञालोप से असमाधि होने से परिणाम बिगड जाते हैं ।
सदासुखदासजी